बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

बुधवार, 20 सितंबर 2017

आभासी दुनिया का साभासी सच



                               आभासी दुनिया का साभासी सच
                               जो दीखता है वो होता नहीं ,जो होता है वो दीखता नहीं..

                         आज बस में थोड़े कम लोग थे और मेरे सामने की सीट पर बैठी एक लड़की के हाथ में Mobile था । वो कुछ type कर रही थी माने chatting कर रही थी । न चाहकर भी मैं उस पर से अपना ध्यान हटा नही पाई । उसके होठों पर उभर आई मुस्कराहट उसकी आँखों में अजीब सी शोखी पैदा कर रही थी । मैं उसे देखती रही की इस आभासी दुनिया से मिली मुस्कराहट आभासी नहीं, साभासी थी (Realistic) थी । मैं उसके चहरे पर उभरते भावों को देखती रही कुछ भी तो आभासी नही था सब यथार्थ था उसकी मुस्कराहट ,उसके हाथ में वो mobile , उस पर टाइप करते उसके हाथ और उसको देखती हुई मैं .. सब यथार्थ, हकीकत हाँ आभासी था तो इंसान जिससे वो बात कर रही थी जो उस वक़्त न होकर भी इन सब में था /थी ।
                          आज मिली मुस्कराहट कल आंसू भी देगी , गम भी देगी । मिलता है दुख..तय है । सुख और दुख साथ साथ चलते हैं हमेशा । हर सुख आने वाले दुख के लिए नींव तैयार करता है और उसको भोगना पड़ता है क्यूंकि संवेदनाएं कभी आभासी नहीं होती वो यथार्थ से जुड़ी होती हैं । आभासी दुनिया ऐसी ही रहेगी कुछ भी न बदलेगा क्यूंकि नहीं देख पाता कोई तुम्हारे चेहरे पर उभरी मुस्कराहट या  उदासी  ,उसे तो दिखती है बस keypad पर लिखी एक इबारत जिसे पढ़कर या अनपढ़े वो बना देता है कोई स्माईली और इस तरह आपकी संवेदनाएं सिर्फ आभासी बन कर रह जाती हैं एक दिन किसी के लिए !!


(चार साल पहले ऑफिस जाती बार देखे दृश्य से प्रेरित )

सु-मन

बुधवार, 13 सितंबर 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१३)





शाम खामोश होने को है और रात गुफ्तगू करने को आतुर ... इस छत पर काफी शामें ऐसी ही बीत जाती हैं ...आसमां को तकते हुए .... सामने पहाड़ी पर वो पेड़ आवाज लगाते हैं ..कुछ उड़ते परिदों को ..आओ ! बसेरा मिलेगा तुम्हें ..पर परिंदे उड़ जाते हैं दूर उस ओर ... अपने साथी संग .. सुनसान जंगल में रह जाती है पत्तों की चुप्पी ...।

आसमां तारों से भर चूका है ,सुबह की बदली का एक टुकड़ा बेतरतीब सा फैला छत पर कर रहा इन्तजार चाँद का ...।।



सु-मन

सोमवार, 14 अगस्त 2017

इन्तज़ार का सम्मोहन



और तुम फिर
हो जाते हो मुझसे दूर
अकारण , निरुद्देश्य ...
ये जानकर भी
कि आआगे तुम पुनः
मेरे ही पास 

स्वैच्छिक , समर्पित ...
सच मानो -
हर बार की तरह
न पूछूँगी कोई प्रश्न
न ही तुम देना कोई अर्जियां
कि तुम्हारा पलायन कर
फिर लौट आना
मेरे इन्तज़ार के सम्मोहन का साक्षी है !!


सु-मन

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

तुम और मैं















अनगिनत प्रयास के बाद भी
अब तक
'तुम' दूर हो 
अछूती हो 
और 'मैं' 
हर अनचाहे से होकर गुजरता प्रारब्ध ।

एक दिन किसी उस पल 
बिना प्रयास 
'तुम' चली आओगी
मेरे पास 
और बाँध दोगी 
श्वास में एक गाँठ ।

तब तुम्हारे आलिंगन में 
सो जाऊँगा 'मैं' 
गहरी अनजगी नींद !
*****

उनींदी से भरा हूँ 'मैं' , नींदों से भरी हो 'तुम' । 
चली आओ कि दोनों इस भरेपन को अब खाली कर दें !!

सु-मन 

सोमवार, 24 जुलाई 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१२)






                         दोस्त वह जो जरूरत* पर काम आये ।
                         सोच में हूँ कि मैं / हम जरूरत का सामान हैं । जरूरत पड़ी तो उपयोग कर लिया नहीं तो याद भी नहीं आती । रख छोड़ते हैं मेरा / हमारा नाम स्टोर रूम की तरह मोबाइल की कोन्टक्ट लिस्ट में कोई जरूरत पड़ने तक !

फिर भी , मैं हूँ / हम हैं उम्र की आखिरी सतह तक एक दूसरे के लिए , गर समझ सको तो समझना !!


सु-मन 

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (११)




                           सुबह और रात के बीच बाट जोहता एक खाली दिन ... इतना खाली कि बहुत कुछ समा लेने के बावजूद भी खाली .... कितने लम्हें ..कितने अहसास ...फिर भी खाली ... सूरज की तपिश से भी अतृप्त .. बस बीत जाना चाहता है | तलाश रहा कुछ ठहराव .. जहाँ कुछ पल ठहर सके ...अपने खालीपन को भर सके  ।



ठहराव जरुरी है नव सृजन के लिए ... 
इसलिए ऐ शाम ! 
रख रही हूँ एक और दिन तेरी दहलीज़ पर !!



सु-मन

गुरुवार, 29 जून 2017

हे निराकार !











हे निराकार !

तू ही प्रमाण , तू ही शाख
तू ही निर्वाण , तू ही राख

तू ही बरकत , तू ही जमाल
तू ही रहमत , तू ही मलाल

तू ही रहबर , तू ही प्रकाश
तू ही तरुबर , तू ही आकाश

तू ही जीवन , तू ही आस
तू ही सु-मन , तू ही विश्वास !!

*******
मन में विश्वास है और विश्वास में तुम
मेरे आकारित परिवेश के तुम एकमात्र प्रहरी हो ।

सु-मन

शनिवार, 24 जून 2017

हे ईश्वर !












कर्मों के फल का
उपासनाओं के तेज़ का
दुख के भोगों का
सुख की चाहों का
मन के विश्वास का
ईश्वर की आराधना का
अपनों के साथ का
रिश्तों के जुड़ाव का
निश्छल प्रार्थनाओं का
होता ही होगा कोई मोल ..
*
*
शरीर की नश्वरता का
जन्म मरण के खेल का
विधि के विधान का
विपदा के निदान का
श्वास की गति का
जिंदगी की मोहलत का
नहीं होता है कोई तोल...

हे ईश्वर !
ये जीवन तेरे पूर्वाग्रह में समर्पित हो !!


सु-मन 

मंगलवार, 6 जून 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१०)





                                   एक कहानी होती है । जिसमें खूब पात्र होते हैं । एक निश्चित समय में दो पात्रों के बीच वार्तालाप होता है । दो पात्र कोई भी वो दो होतें हैं जो कथानक के हिसाब से तय होते हैं । कथानक कौन लिखता है... उन किसी को नहीं मालूम । मालूम है तो बस इतना कि उस लिखे को मिटाया नहीं जा सकता । प्रतिपल लिखे को आत्मसात कर कहानी को आगे बढ़ाते जाते हैं । इस कहानी में मध्यांतर भी नहीं होता कि कोई सोचे जो पीछे घटित हुआ उसके अनुसार आगे क्या घटित होगा । बस होता जाता है, सब एक सुव्यवस्थित तरीके से । कहानी कभी खत्म नहीं होती । हाँ बस पात्र बदलते रहते हैं ।

वार्तालाप खत्म होने पर भी पात्र इकहरा नहीं होता , जाने क्यूँ ...
दोहरापन हमेशा लचीला होता है शायद इसलिए !!


सु-मन