गुरुवार, 13 जुलाई 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (११)




                           सुबह और रात के बीच बाट जोहता एक खाली दिन ... इतना खाली कि बहुत कुछ समा लेने के बावजूद भी खाली .... कितने लम्हें ..कितने अहसास ...फिर भी खाली ... सूरज की तपिश से भी अतृप्त .. बस बीत जाना चाहता है | तलाश रहा कुछ ठहराव .. जहाँ कुछ पल ठहर सके ...अपने खालीपन को भर सके  ।



ठहराव जरुरी है नव सृजन के लिए ... 
इसलिए ऐ शाम ! 
रख रही हूँ एक और दिन तेरी दहलीज़ पर !!



सु-मन

गुरुवार, 29 जून 2017

हे निराकार !











हे निराकार !

तू ही प्रमाण , तू ही शाख
तू ही निर्वाण , तू ही राख

तू ही बरकत , तू ही जमाल
तू ही रहमत , तू ही मलाल

तू ही रहबर , तू ही प्रकाश
तू ही तरुबर , तू ही आकाश

तू ही जीवन , तू ही आस
तू ही सु-मन , तू ही विश्वास !!

*******
मन में विश्वास है और विश्वास में तुम
मेरे आकारित परिवेश के तुम एकमात्र प्रहरी हो ।

सु-मन

शनिवार, 24 जून 2017

हे ईश्वर !












कर्मों के फल का
उपासनाओं के तेज़ का
दुख के भोगों का
सुख की चाहों का
मन के विश्वास का
ईश्वर की आराधना का
अपनों के साथ का
रिश्तों के जुड़ाव का
निश्छल प्रार्थनाओं का
होता ही होगा कोई मोल ..
*
*
शरीर की नश्वरता का
जन्म मरण के खेल का
विधि के विधान का
विपदा के निदान का
श्वास की गति का
जिंदगी की मोहलत का
नहीं होता है कोई तोल...

हे ईश्वर !
ये जीवन तेरे पूर्वाग्रह में समर्पित हो !!


सु-मन 

मंगलवार, 6 जून 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१०)





                                   एक कहानी होती है । जिसमें खूब पात्र होते हैं । एक निश्चित समय में दो पात्रों के बीच वार्तालाप होता है । दो पात्र कोई भी वो दो होतें हैं जो कथानक के हिसाब से तय होते हैं । कथानक कौन लिखता है... उन किसी को नहीं मालूम । मालूम है तो बस इतना कि उस लिखे को मिटाया नहीं जा सकता । प्रतिपल लिखे को आत्मसात कर कहानी को आगे बढ़ाते जाते हैं । इस कहानी में मध्यांतर भी नहीं होता कि कोई सोचे जो पीछे घटित हुआ उसके अनुसार आगे क्या घटित होगा । बस होता जाता है, सब एक सुव्यवस्थित तरीके से । कहानी कभी खत्म नहीं होती । हाँ बस पात्र बदलते रहते हैं ।

वार्तालाप खत्म होने पर भी पात्र इकहरा नहीं होता , जाने क्यूँ ...
दोहरापन हमेशा लचीला होता है शायद इसलिए !!


सु-मन

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

सुमन की पाती


























अप्रैल 2014 की बात है , नवरात्रे चल रहे थे और मेरे छत पर ये गुलाब महक रहे थे | मॉम रोज़ एक फूल देवी माँ को चढ़ाना चाहते थे और मैं इन फूलों से इनके हिस्से की जिंदगी नहीं छीनना चाहती थी और आज भी इन फूलों को नहीं तोड़ने देती हूँ , कैसे तोडू ये बस यही कहते हैं मुझसे ...



मेरी बगिया का सुमन मुझसे ये कहता है ..

सुमन कहे पुकार के , सु-मन मुझे न तोड़
महकाऊँ घर आँगन , मुझसे मुँह न मोड़

ये डाली मुझे प्यारी , नहीं देवालय की चाह
बतियाऊँ रोज़ तुमसे , रहने दे अपनी पनाह

 मैं सु-मन , सुमन को ये कहती है ...

तू सुमन मैं भी सु-मन , जानू तेरे एहसास
खिलता रहे तू हमेशा . मत हो यूँ उदास  

तेरी चाह मुझे प्यारी , नहीं करूंगी तुझे अर्पण
देव होता भाव का भूखा , मन से होए है समर्पण !!



सु-मन 

शनिवार, 25 मार्च 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (९)






                      आजकल बहुत सारे शब्द मेरे ज़ेहन में घूमते रहते हैं इतने कि समेट नहीं पा रही हूँ अनगिनत शब्द अंदर जाकर चुपचाप बैठ गए हैं । एक दोस्त की बात याद आ रही है जब कुछ अरसा पहले यूँ ही शब्द मेरे ज़ेहन में कैद हो गए थे ।उसने कहा था , ' सुमी ! अक्सर ऐसा होता है जब बहुत सारे शब्द हमारे अंदर इकट्ठे हो जाते हैं और हमसे आँख मिचोली खेलते हैं । हमारे लाख बुलाने पर भी बाहर नहीं आते । होने दो इकट्ठे इन्हें अपने अंदर ,एक दिन खुद-ब-खुद बाहर आ जाएंगे और पन्नों पर उतर जाएंगे ।' कुछ वक़्त बाद सच में वो शब्द लौट आये मेरे पास मेरे डायरी के पन्नों पर उतर गए । 
                         उस दोस्त की बात मुझे अक्सर याद आती है जब भी एक कैद से मुक्त होकर शब्द मुझसे बात करते हैं । उस दोस्त से अब ज्यादा बात नहीं होती जिंदगी की भागदौड़ बहुत बढ़ गई है ना । उसे तो अपनी कही ये बात भी याद नहीं होगी शायद | 

मैं इंतजार में हूँ कि अबके भी शब्द मेरी सुन लें और लौट आये मुझ तक कि मेरी डायरी के पन्नों में बसंत खिलना बाकी है अभी !!


सु-मन

सोमवार, 20 मार्च 2017

वो लड़की ~ 4
















वो लड़की
अक्सर देखती रहती
सूर्य किरणों में उपजे
छोटे सुनहरी कणों को
हाथ बढ़ा पकड़ लेती
दबा कर बंद मुट्ठी में
ले आती अपने कमरे में
खोल कर मुट्ठी
बिखेर देती सुनहरापन
:
रात, पनीली आँखों में
चाँद को भरकर
ठीक इस तरह
रख देती कमरे में
शबनमी चाँदनी
खिड़की और दरवाजे को बंद कर
गुनगुनाती कोई मनचाहा गीत
वो लड़की पगली बेहिसाब है !!


सु-मन 

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

प्रेम















प्रेम !
हर दिन का उजाला
हर रात की चाँदनी
हर दोपहर की तपिश
हर शाम की मदहोशी

तुम्हें एक दिन में समेट पाऊं
इतनी खुदगर्ज़ नहीं .....

मेरे प्रिय !
तुम्हें चिन्हित
तुम्हारा ये दिन
तुम्हें बहुत बहुत मुबारक !!


सु-मन  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

वो लड़की ~ 3













बहुत उदास सी है 
शाम आज 
आसमान भी
खाली खाली 
घर की ओर बढ़ते
उसके कदमों में 
है कुछ भारीपन 
यूँ तो अकसर 
दबे पाँव ही आती है 
ये उदासी 
पर आज 
न जाने क्यूँ 
इसकी आहट में 
है चुभन सी 
जो उसकी रूह को 
कचोटती हुई 
भर रही है 
उसकी नसों में 
एक धीमा ज़हर 
और वो 
अजाने ही उसको 
समेट रही 
आँखों के प्याले में 
पी रही 
घूँट घूँट नमी 
वो लड़की बहुत उदास है !!


सु-मन 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

वो लड़की ~2











वो लड़की
सफ़र में
जाने से पहले
बतियाती है
आँगन में खिले
फूल पत्तों से
देती है उन्हें हिदायत
हमेशा खिले रहने की
रोज़ छत पर
दाना चुगने आई
चिड़िया को
दे जाती है
यूँ ही हर रोज़
आते रहने का न्योता
चाहती है वो
माँ का घर हरा – भरा
.
.
घर से निकलते वक़्त
टेकती है सर
घर की देहड़ी पर
बिना पीछे मुड़े
बढ़ा देती है कदम आगे
हर जरूरी सामान
छोड़ जाती है
पीछे ही घर में
एक छोटी डायरी में
लिख जाती है
सारा हिसाब किताब
माँ को दे जाती है
जल्दी लौट आने का
झूठा दिलासा
वो लड़की अंतिम सफ़र पर है !!


सु-मन